पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने डीएसपी राम गोपाल के खिलाफ 2008 की प्राथमिकी में आगे की जांच का निर्देश देने वाले चंडीगढ़ अदालत के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है।
न्यायमूर्ति रमेश चंद्र डिमरी ने राम गोपाल की याचिका पर यह आदेश पारित किया, जिसमें यूटी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित 26 मार्च के आदेश को चुनौती दी गई थी। मामले को उठाते हुए, अदालत ने केंद्र शासित प्रदेश और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस ऑफ मोशन जारी किया और आक्षेपित आदेश के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी। ये निर्देश कम से कम 1 दिसंबर तक लागू रहेंगे जो मामले की सुनवाई की अगली तारीख है।
केंद्र शासित प्रदेश की ओर से नोटिस स्वीकार करते हुए, एक वकील जवाब/स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने के लिए समय मांगता है। अनुरोध को स्वीकार करते हुए पीठ ने सुनवाई स्थगित कर दी, ‘विचाराधीन याचिका के गुण-दोष पर टिप्पणी किए बिना यह आदेश दिया जाता है कि सुनवाई की अगली तारीख तक आदेश का संचालन पर रोक रहेगी।
याचिकाकर्ता की ओर से पीठ के समक्ष पेश होते हुए अधिवक्ता विशाल गर्ग नरवाना ने अन्य बातों के अलावा दलील दी कि आक्षेपित आदेश कानून के विपरीत है क्योंकि 25 फरवरी, 2010 के आदेश ने इस मामले को हमेशा के लिए बंद कर दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि में जाते हुए, नरवाना ने पीठ को बताया कि अप्रैल 2008 में चंडीगढ़ के सेक्टर 3 पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत धोखाधड़ी और अन्य अपराधों के लिए एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
नरवाना ने दलील दी कि मामले की जांच पहले ही एक आईपीएस अधिकारी कर चुके हैं और रद्दीकरण रिपोर्ट दायर की जा चुकी है। याचिका में कहा गया है, ‘याचिकाकर्ता के योग प्रमाण पत्र और अंतरराष्ट्रीय योग कार्यक्रम में भागीदारी, इटली में आयोजित कार्यक्रम के राजनयिक सत्यापन, प्रमाण पत्र और पदक के संबंध में एक आईपीएस अधिकारी ने प्राथमिकी की पूरी जांच की। जांच पूरी होने के बाद एसएसपी की मंजूरी के बाद चार सितंबर 2008 को मजिस्ट्रेट के समक्ष रद्दीकरण रिपोर्ट पेश की गई।
रद्दीकरण रिपोर्ट को अंततः 25 फरवरी, 2010 को चंडीगढ़ के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा स्वीकार कर लिया गया और 4 सितंबर, 2017 को उच्च न्यायालय द्वारा आदेश के खिलाफ एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई। इसमें कहा गया है, ‘उक्त आदेश को अंतिम रूप दिया गया है क्योंकि इसे कभी भी शीर्ष अदालत के समक्ष चुनौती नहीं दी गई थी।
याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि “यूटी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने आक्षेपित आदेश के माध्यम से – एक गलत अवैध और विकृत तरीके से – एक अनधिकृत प्रशासनिक आदेश/नोटिंग पर भरोसा करते हुए, याचिकाकर्ता को नोटिस जारी किए बिना या सुनवाई का अवसर दिए बिना, आगे की जांच का निर्देश दिया।
