सुप्रीम कोर्ट ने रोहतक एमडीयू फैकल्टी की ‘फर्जी’ पीएचडी डिग्री की जांच के आदेश दिए

सुप्रीम कोर्ट ने महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (एमडीयू), रोहतक में कार्यरत एक सहायक प्रोफेसर की कथित फर्जी पीएचडी डिग्री की जांच के आदेश दिए हैं।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने कहा कि पीएचडी की डिग्री इस पद के लिए आवश्यक योग्यता नहीं है और सहायक प्रोफेसर ने स्वतंत्र रूप से यूजीसी-नेट परीक्षा उत्तीर्ण करने की अनिवार्य आवश्यकता को पूरा किया है।

हालांकि, पीठ ने एमडीयू को निर्देश दिया कि वह उसकी डिग्री की प्रामाणिकता का पता लगाए। यदि डिग्री जाली पाई जाती है, तो विश्वविद्यालय सहायक प्रोफेसर पर मुकदमा चलाने के लिए पुलिस को सूचित कर सकता है।

पीठ ने कहा, ‘जांच में छठे प्रतिवादी (सहायक प्रोफेसर, जिनके खिलाफ अब सुप्रीम कोर्ट ने जांच का आदेश दिया है) को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के अधिकारियों की मौजूदगी में अपनी पीएचडी की डिग्री पेश करनी होगी, जिसके आधार पर इस अदालत के समक्ष हलफनामा दायर किया गया था। ” उसने कहा।

पीठ ने कहा, ”छठे प्रतिवादी को प्रभावी बचाव करने और गवाहों से जिरह करने का अवसर दिया जाएगा। जांच के आधार पर, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार आयोजित की जानी है, कानून में अनुमति के अनुसार आगे कदम उठाए जा सकते हैं, “अदालत के 8 सितंबर के आदेश में कहा गया है।

एमडीयू से संबद्ध सतजिंदा कल्याण कॉलेज, रोहतक द्वारा 14 फरवरी, 2018 को सहायक प्रोफेसर (शारीरिक शिक्षा) के पद के लिए वैकेंसी का विज्ञापन दिया गया था। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद, आरोपी सबसे योग्य उम्मीदवार के रूप में उभरा और उसे पद पर नियुक्त किया गया।

असफल उम्मीदवारों ने उच्च न्यायालय में उनकी नियुक्ति को चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि यह फर्जी पीएचडी डिग्री के बल पर हासिल की गई थी। हालांकि, कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

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