जस्टिस यशवंत वर्मा पर जजों की पैनल ने लोकसभा अध्यक्ष को सौंपी रिपोर्ट

न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को हटाने के कारणों की जांच करने वाली न्यायाधीशों की जांच समिति ने सोमवार को संसद भवन में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को अपनी रिपोर्ट सौंप दी।

लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने बताया कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत वैधानिक आवश्यकताओं के अनुसार पेश की गई रिपोर्ट को उचित समय पर संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाएगा।

बिड़ला ने 12 अगस्त, 2025 को समिति का गठन किया था। हालांकि, उन्होंने इस साल फरवरी में इसका पुनर्गठन किया था। पुनर्गठित समिति में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायाधीश, भारत के सर्वोच्च न्यायालय; न्यायमूर्ति चंद्रशेखर, मुख्य न्यायाधीश, बॉम्बे उच्च न्यायालय; और बीवी आचार्य, वरिष्ठ अधिवक्ता, कर्नाटक उच्च न्यायालय।

न्यायमूर्ति कुमार और आचार्य पिछली समिति के सदस्य थे, जबकि न्यायमूर्ति चंद्रशेखर को नए सदस्य के रूप में शामिल किया गया था। उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव की जगह ली।

इससे पहले, पिछले साल 14 मार्च को दिल्ली में अपने आधिकारिक आवास से आग लगने की घटना के दौरान बेहिसाब अधजली नकदी की बरामदगी को लेकर कदाचार के लिए उन्हें हटाने की कार्यवाही का सामना कर रहे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति वर्मा ने इस साल 9 अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंप दिया था। इस बारे में कोई स्पष्टता नहीं है कि उनका इस्तीफा राष्ट्रपति ने स्वीकार किया है या नहीं।

अगर उनका इस्तीफा राष्ट्रपति स्वीकार कर लेते हैं तो न्यायाधीश के रूप में उन्हें हटाने की कार्यवाही निरर्थक हो जाएगी और वह कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सौमित्र सेन और सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनाकरन जैसे दागी न्यायाधीशों की लीग में शामिल हो जाएंगे, जिन्होंने पद से हटाने की कार्यवाही के बीच इस्तीफा देने का फैसला किया।

हालांकि, इस्तीफे से वह आपराधिक कार्यवाही के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं क्योंकि वह संवैधानिक अदालत के न्यायाधीशों द्वारा प्राप्त प्रतिरक्षा खो देते हैं।

इसके साथ ही न्यायमूर्ति वर्मा ने उन्हें हटाने के लिए न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के तहत लोकसभा द्वारा नियुक्त एक पैनल द्वारा की गई जांच से भी अपना नाम वापस ले लिया और कहा कि इसमें उनकी भागीदारी जारी रखने से पहले की जांच को वैधता मिल जाएगी, जहां उनसे दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहने के दौरान उनके दिल्ली स्थित आवास से कथित तौर पर मिले धन के स्रोत पर ‘अनुत्तरित’ सवाल का जवाब देने के लिए कहा गया था.

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