उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी बिसात बिछने लगी है. जौनपुर जिले की 9 विधानसभा सीटों पर राजनीतिक समीकरण बेहद दिलचस्प मोड़ पर हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में जौनपुर की 9 में से 5 सीटों पर समाजवादी पार्टी (सपा) और 4 सीटों पर भाजपा-गठबंधन ने जीत हासिल की थी. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में सपा का पलड़ा भारी नजर आया. 2027 के महासमर से पहले जौनपुर का सियासी ‘मूड क्या है’ इस पर जिले के वरिष्ठ पत्रकारों ने अपनी बात रखी है.
1.मल्हनी विधानसभा सीट: धनंजय सिंह फैक्टर और सपा का गढ़
मल्हनी विधानसभा सीट (पूर्व में रारी) लंबे समय से यादव बाहुल्य मानी जाती रही है और पूर्व कैबिनेट मंत्री स्वर्गीय पारसनाथ यादव का गढ़ रही है. वर्तमान में उनके पुत्र लकी यादव सपा से विधायक हैं.
2. बदलापुर विधानसभा सीट: ‘बदलापुर’ में बदलाव की सुगबुगाहट
बदलापुर सीट अपने नाम के अनुरूप अक्सर मिजाज बदलने के लिए जानी जाती है.
विपक्ष का रुख: फिलहाल सपा के पास बदलापुर में संगठन की कमी और बड़ा चेहरा न होना मुख्य चुनौती है. यदि सपा या बसपा कोई दमदार चेहरा उतारती है तो मुकाबला बेहद कांटे का हो जाएगा.
3.जफराबाद विधानसभा सीट: आमने-सामने की तीखी टक्कर
जफराबाद का राजनीतिक इतिहास काफी अप्रत्याशित परिणाम देने वाला रहा है.
2022 का गणित: 2017 में भाजपा से जीते डॉ. हरेंद्र सिंह 2022 के चुनाव में 87,000 से अधिक वोट पाने के बावजूद सुभासपा-सपा गठबंधन के प्रत्याशी जगदीश नारायण राय से चुनाव हार गए थे. इसका मुख्य कारण सुभासपा के साथ जुड़ने वाला लगभग 35-40 हजार भर/राजभर मतदाताओं का वोट बैंक था.
2027 की संभावना: डॉ. हरेंद्र सिंह और वर्तमान विधायक जगदीश नारायण राय दोनों की ही हर गांव और मतदाताओं में सीधी पकड़ है. यदि 2027 में दोबारा यही दोनों आमने-सामने होते हैं तो जौनपुर की सबसे दिलचस्प लड़ाई इसी सीट पर देखने को मिलेगी.
4. जौनपुर सदर विधानसभा सीट: प्रत्याशी के चयन पर टिका भविष्य
सदर सीट से राज्यमंत्री गिरीश चंद्र यादव लगातार दो बार से विधायक चुने गए हैं.
2022 का समीकरण: 2022 में सपा, बसपा और कांग्रेस तीनों ने ही मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे जिससे मतों का ध्रुवीकरण हुआ और गिरीश यादव को हिंदू बहुल क्षेत्रों से एकतरफा समर्थन मिला.
2027 की चुनौती: वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि यदि 2027 में विपक्ष (सपा या गठबंधन) किसी मजबूत हिंदू उम्मीदवार को टिकट देता है तो गिरीश यादव के लिए राह काफी कठिन हो सकती है. हालांकि संगठन में मजबूत पकड़ के चलते उनका टिकट कटने के आसार बेहद कम हैं.
5. मुंगरा बादशाहपुर सीट
सीमा द्विवेदी की मजबूत दावेदारीपटेल बाहुल्य मुंगरा बादशाहपुर सीट पर वर्तमान में सपा के पंकज पटेल विधायक हैं.
भाजपा की रणनीति: राज्यसभा सांसद सीमा द्विवेदी का कार्यकाल समाप्त होने को है और वे इस सीट पर दोबारा भाजपा का कब्जा जमाने के लिए काफी सक्रिय हैं.
स्थानीय गुटबाजी: 2022 में भाजपा के अंदरूनी कलह का फायदा सपा को मिला था. यदि भाजपा सीमा द्विवेदी पर दांव लगाती है तो वह सपा को कड़ी चुनौती दे सकती हैं.
6. शाहगंज विधानसभा सीट
निषाद और राजभर मतों का असर 2022 में शाहगंज से निषाद पार्टी के रमेश सिंह ने चार बार के विधायक रहे सपा के शैलेंद्र यादव ‘ललई’ को बहुत कम मतों से हराया था.
गठबंधन का फायदा: इस बार एनडीए गठबंधन में निषाद पार्टी और सुभासपा दोनों साथ हैं जिससे निषाद और राजभर मतों का एकमुश्त ध्रुवीकरण भाजपा गठबंधन के पक्ष में जा सकता है.
सपा का जनाधार: शैलेंद्र यादव ललई की अपनी व्यक्तिगत छवि और क्षेत्र में पकड़ काफी मजबूत है. साथ ही शाहगंज नगरपालिका पर सपा का कब्जा होने के कारण नगर क्षेत्र का वोट चुनाव परिणाम तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगा.
7. मछलीशहर विधानसभा सीट
डॉ. रागिनी सोनकर का मजबूत किलामछलीशहर सीट पर वर्तमान में सपा की पढ़ी-लिखी और मुखर नेता डॉ. रागिनी सोनकर विधायक हैं.
जनता से जुड़ाव: विश्लेषकों का आकलन है कि डॉ. रागिनी सोनकर ने धरातल पर जनता की नब्ज पकड़ रखी है और अपनी कार्यशैली से मतदाताओं को साध रखा है.
भाजपा के लिए मुश्किल: 2027 के चुनाव में भाजपा के लिए मछलीशहर सीट पर रागिनी सोनकर को भेद पाना बेहद मुश्किल माना जा रहा है. भाजपा में स्थानीय स्तर पर अंदरूनी कलह भी सपा के लिए फायदेमंद साबित हो रही है.

