‘आज का यूपी’ राज्य की राजनीति और बड़े घटनाक्रमों का विश्लेषण करता है. आज के एपिसोड में तीन बड़ी खबरों पर चर्चा की गई है. पहली, बिहार के बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत के बाद क्या उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी नए सियासी समीकरण बन सकते हैं और क्या इसका असर ब्राह्मण वोट बैंक पर पड़ेगा? दूसरी, समाजवादी पार्टी ने अचानक ब्राह्मणों पर अपना फोकस क्यों बढ़ाया और जनेश्वर मिश्र जयंती पर आयोजित ब्राह्मण सम्मेलन के क्या राजनीतिक मायने हैं? तीसरी, क्या 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी अपने परंपरागत सवर्ण वोट बैंक को एकजुट रख पाएगी या विपक्ष नया राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने में सफल होगा? आइए इन तीनों मुद्दों को विस्तार से समझते हैं.
क्या बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत यूपी की राजनीति का समीकरण बदलेगी?
समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मण सम्मेलन के जरिए क्या दिया नया राजनीतिक संदेश?
बांकीपुर के नतीजों के कुछ ही दिनों बाद लखनऊ में समाजवादी पार्टी ने जनेश्वर मिश्र की जयंती पर ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित किया. इस सम्मेलन में बड़ी संख्या में ब्राह्मण समाज की मौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी. अब तक अखिलेश यादव लगातार पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) की राजनीति को आगे बढ़ा रहे थे, लेकिन इस सम्मेलन में उन्होंने पीडीए की नई व्याख्या करते हुए कहा कि ‘पी’ का मतलब पंडित भी है. उन्होंने यह भी कहा कि ब्राह्मण समाज भी खुद को पीड़ित महसूस कर रहा है.
क्या बीजेपी के सवर्ण वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश सफल होगी?
उत्तर प्रदेश में 2014 के बाद से ब्राह्मण समेत अधिकांश सवर्ण समुदाय बीजेपी के सबसे मजबूत समर्थकों में रहे हैं. कई राजनीतिक विवादों और एनकाउंटर जैसे मुद्दों के बावजूद यह वोट बैंक बड़े पैमाने पर बीजेपी के साथ बना रहा. हालांकि बिहार में भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद बनी राजनीतिक परिस्थितियों और बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों ने विपक्ष को यह भरोसा दिया है कि सवर्ण समाज के एक हिस्से तक पहुंच बनाई जा सकती है.

